मध्‍यप्रदेश

इंदौर में फर्जी रजिस्ट्री का 700 करोड़ का घोटाला, वारिसहीन संपत्तियों को बनाया गया निशाना

इंदौर में हुए फर्जी रजिस्ट्री घोटाले का दायरा अब पहले के अनुमान से कहीं बड़ा निकलकर सामने आया है। पहले इसे करीब 100 करोड़ रुपये का माना जा रहा था, लेकिन अब जब संपत्तियों का बाजार मूल्य देखा गया तो यह घोटाला 700 करोड़ रुपये तक पहुंचता दिख रहा है। जिन संपत्तियों को निशाना बनाया गया, वे अधिकतर ऐसी थीं जिनके मालिक या तो अब जीवित नहीं हैं, कोई वारिस नहीं है या फिर जो लंबे समय से इंदौर से बाहर रहते हैं।

इस संगठित फर्जीवाड़े को अंजाम देने वाले गिरोह ने जांच को भटकाने के लिए कई साजिशें रचीं। यहां तक कि वरिष्ठ जिला पंजीयक के खिलाफ भी फर्जी शिकायतें की गईं ताकि कार्रवाई की दिशा मोड़ी जा सके। रिकॉर्ड रूम स्तर पर निचले कर्मचारियों और बाहरी लोगों की मिलीभगत से यह पूरा खेल खेला गया। सूचना के अधिकार (RTI) जैसे प्रावधानों का भी दुरुपयोग किया गया ताकि अधिकारियों को उलझाया जा सके और फर्जी रजिस्ट्री की सत्यापित कॉपियां हासिल की जा सकें।

घोटाले की शुरुआत अगस्त-सितंबर 2024 में मुंबई निवासी हस्तीमल चौकसे की शिकायत से हुई। चौकसे हर साल इंदौर आकर अपनी संपत्तियों का टैक्स भरते हैं। जब वह बीते वर्ष टैक्स भरने पहुंचे, तो नगर निगम ने बताया कि जोन 3 में स्थित शिवविलास पैलेस का प्लाट अब उनके नाम पर नहीं है। यह जानकर वे हैरान रह गए। उन्होंने तत्काल कलेक्टर, निगमायुक्त और पंजीयन विभाग में शिकायत दर्ज कराई।

कलेक्टर ने मामले की जांच का जिम्मा वरिष्ठ जिला पंजीयक दीपक शर्मा को सौंपा। जांच में सामने आया कि रिकॉर्ड में फर्जी रजिस्ट्री लगाकर सत्यापित कॉपी निकाली गई और नगर निगम में नामांतरण करवा लिया गया। इस पूरे मामले में रिकॉर्ड विभाग के कर्मचारी मर्दन सिंह रावत की भूमिका सामने आई है, जिन्हें सस्पेंड किया जा चुका है। कलेक्टर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसने शुरुआती जांच में 20 रजिस्ट्रियों को संदिग्ध पाया।

जांच में पता चला कि यह फर्जीवाड़ा बेहद सुनियोजित तरीके से किया गया। जिन संपत्तियों के मालिकों का ध्यान नहीं था या जिनके वारिस नहीं थे, उन्हें पहले चिन्हित किया गया। फिर बाहर से फर्जी रजिस्ट्री तैयार कर रिकॉर्ड बुक में असली कागज़ों को हटाकर चिपकाया गया। अंगुली पंजी से उस पन्ने को फाड़ दिया गया जिसमें अंगूठा या हस्ताक्षर मौजूद होते हैं। इसके बाद सूचना के अधिकार में आवेदन लगाकर इन रजिस्ट्री की सत्यापित कॉपियां हासिल की जाती थीं, ताकि इसे वैध दिखाया जा सके।

इन दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति को बेचना, बैंक से लोन लेना और नामांतरण जैसे कार्य किए जा रहे थे। इस पूरे घोटाले में अब तक 32 हेक्टेयर जमीन से जुड़ी 20 रजिस्ट्रियां फर्जी पाई गई हैं। इनमें मनोरमागंज, मित्रबंधु नगर, शिवविलास पैलेस, न्याय नगर और उषा नगर जैसे प्रमुख इलाकों की महंगी संपत्तियां शामिल हैं जिनकी कुल बाजार कीमत करीब 700 करोड़ रुपये आंकी गई है।

इस घोटाले को छुपाने के लिए कुछ लोगों ने वरिष्ठ पंजीयन अधिकारी पर भी रिश्वत मांगने जैसे फर्जी आरोप लगाए। जांच समिति ने पाया कि आरोप लगाने वालों की रजिस्ट्री पहले ही फर्जी साबित हो चुकी थी और इसलिए सत्यापित कॉपी नहीं दी गई थी। इसके बावजूद आरोपियों ने जून अंत में कलेक्टर को शिकायतें देकर जांच को भटकाने की कोशिश की।

इन शिकायतों में करोड़ों की संपत्तियों का जिक्र है। शिकायतकर्ताओं ने नामांतरण रोकने के लिए पंजीयन विभाग के अधिकारियों पर मिलीभगत और साजिश के आरोप लगाए। कई मामलों में सुनील पाटीदार, चंदन पाटीदार और नंदकिशोर पाटीदार जैसे नाम सामने आए हैं, जिन पर फर्जीवाड़ा करने का आरोप है। शिकायतों में यह भी कहा गया कि कर्मचारियों ने मिलकर संपत्तियों को फर्जी घोषित करवा दिया ताकि उनका नाम हटाया जा सके।

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, सत्यापित कॉपी हासिल करने के लिए कुछ लोग बार-बार पंजीयन कार्यालय के चक्कर काटते रहे। जब आवेदन खारिज हुए तो सूचना के अधिकार के तहत भी प्रयास किए गए ताकि किसी तरह कॉपी मिल सके और फर्जी रजिस्ट्री को वैध ठहराया जा सके।

कलेक्टर के निर्देश पर 9 दिसंबर 2024 को गठित जांच समिति ने 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें 20 रजिस्ट्री फर्जी पाई गईं। इनमें से दो मामलों में पहले ही एमजी रोड थाने में केस दर्ज है, जबकि बाकी 18 मामलों में पंढरीनाथ थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। अब पुलिस सभी दस्तावेज जब्त कर यह पता लगा रही है कि इनकी फर्जी कॉपियां किसने निकालीं, किसने इनका उपयोग किया और क्या बैंक लोन लिया गया। जिन लोगों के नाम सामने आएंगे, उन्हें आरोपी बनाया जाएगा।

पुलिस अब रजिस्ट्री दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच भी कराने की तैयारी में है ताकि यह साफ हो सके कि फर्जी दस्तावेज कब और कैसे बनाए गए, किन तकनीकों का इस्तेमाल हुआ और कितनी प्रामाणिकता इनमें है। इस जांच के दायरे में अब पंजीयन विभाग के अधिकारी और दलाल दोनों हैं।

यह मामला सिर्फ इंदौर की नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की रजिस्ट्री व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। सवाल ये है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में इस स्तर की हेराफेरी हो सकती है तो आम नागरिक अपनी संपत्तियों को कैसे सुरक्षित महसूस करें?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *