मध्यप्रदेश में पेंशनर्स के साथ भेदभाव, 27 माह से अटका वेतन और DA एरियर्स भुगतान अब तक अधूरा
मध्यप्रदेश के पेंशनर्स और कर्मचारियों के सामने इन दिनों कई गंभीर समस्याएं खड़ी हैं। 27 माह से लंबित वेतन और 55% DA (महंगाई भत्ता) एरियर्स का भुगतान नहीं होना इस वर्ग के लिए सबसे बड़ा दर्द बना हुआ है। पेंशनर्स लंबे समय से अपने हक की मांग कर रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। सवाल यह है कि क्या “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गया है?
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1. 27 महीने से बकाया वेतन और DA एरियर्स का भुगतान नहीं
मध्यप्रदेश के पेंशनर्स को पिछले 27 महीने से उनका वेतन एरियर्स और DA का बकाया नहीं मिला है। केंद्र सरकार द्वारा 55% DA का भुगतान किया जा चुका है, लेकिन राज्य सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही। इससे लाखों पेंशनर्स आर्थिक रूप से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। उनका कहना है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें सरकार से राहत की उम्मीद थी, लेकिन अब उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
2. भेदभाव का आरोप और सरकार की चुप्पी
राज्य के पेंशनर्स और कर्मचारी संघों ने राज्य सरकार पर लगातार भेदभाव के आरोप लगाए हैं। मध्यप्रदेश राजपत्रित अधिकारी संघ के संयोजक एम.के. सक्सेना ने भी यह स्पष्ट किया है कि पेंशनर्स के साथ न्याय नहीं हो रहा। जबकि केंद्र सरकार ने अपने पेंशनर्स को DA एरियर्स दे दिए, वहीँ राज्य सरकार ने अभी तक कोई आदेश जारी नहीं किया।
3. वेतन विसंगति: 94-95 और 74-75 के व्याख्याताओं में असमानता
मध्यप्रदेश में व्याख्याताओं की वेतन विसंगति भी एक प्रमुख मुद्दा बन चुकी है। 94-95 बैच के व्याख्याताओं को 6600 ग्रेड-पे दिया जा रहा है, जबकि 74-75 के व्याख्याताओं को सिर्फ 5400 ग्रेड-पे मिल रहा है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से भेदभाव दर्शाती है। दोनों समूहों के कार्य और दायित्व समान हैं, लेकिन वेतन में भारी अंतर उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित कर रहा है।
4. तीसरे समयमान वेतनमान में भी भेदभाव
94-95 के जूनियर व्याख्याताओं को तीसरे समयमान वेतनमान 10000-15200 नहीं दिया जा रहा, जबकि सीनियर व्याख्याताओं को यह लाभ मिल चुका है। तीन सीनियर आईएएस अधिकारी इस मामले में सहमति जता चुके हैं, लेकिन विभागीय अधिकारी आदेश जारी करने में टालमटोल कर रहे हैं।
5. महंगाई की मार और DA मर्ज करने की मांग
पेंशनर्स और कर्मचारियों को दिन-ब-दिन बढ़ती महंगाई से राहत देने के लिए 50% DA को मूल वेतन में मर्ज करने की मांग की जा रही है। यह कदम उनके जीवनस्तर को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है। लेकिन राज्य सरकार इस पर भी अभी तक कोई निर्णय नहीं ले सकी है।
6. आयुष्मान भारत योजना में 70+ बुजुर्गों को नहीं मिल रही सुविधा
70 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा नहीं मिल रही है। यह तब और दुखद है जब इन बुजुर्गों को महंगे इलाज, ऑपरेशन और दवाइयों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। सरकारी और निजी दोनों ही अस्पतालों में इन मरीजों को योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा।
7. सीएम स्थानांतरण नीति का पालन नहीं
मुख्यमंत्री द्वारा तय की गई स्थानांतरण नीति के तहत मानवीय आधार पर, बीमारी या पति-पत्नी को एक स्थान पर रखने जैसे प्रावधान हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन नियमों का पालन नहीं हो रहा। इसके चलते ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में अव्यवस्था फैली हुई है और छात्रों की पढ़ाई पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
8. पदोन्नति पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और मानसिक दबाव
राज्य के कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते पदोन्नति नहीं मिल पा रही है। उन्हें उच्च पद का प्रभार तो दिया जा रहा है, लेकिन पदोन्नति नहीं हो रही। इससे कर्मचारियों का मनोबल गिर रहा है और वे मानसिक रूप से दबाव में काम कर रहे हैं।
9. e-Attendance सिस्टम का विरोध
शिक्षा विभाग में लागू किया गया e-Attendance सिस्टम शिक्षकों के लिए निगरानी की तरह काम कर रहा है। शिक्षक इसे अविश्वास की भावना और काम के प्रति अपमानजनक मान रहे हैं। पूरे राज्य में शिक्षक इस नियम के विरोध में हैं और इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
10. राज्य सरकार की निष्क्रियता से विश्वास में कमी
पेंशनर्स और कर्मचारियों का सरकार पर से विश्वास धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। हर मुद्दे पर सहमति होने के बावजूद आदेश जारी न होना सरकारी तंत्र की निष्क्रियता को दर्शाता है। यह वर्ग, जिसने अपनी पूरी सेवा राज्य के लिए समर्पित की, अब अपने ही अधिकारों के लिए दर-दर भटक रहा है।
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निष्कर्ष
मध्यप्रदेश के पेंशनर्स और कर्मचारियों के साथ हो रहे अन्याय और भेदभाव की स्थिति अब गंभीर हो गई है। वेतन और एरियर्स भुगतान, व्याख्याताओं की वेतन विसंगति, बुजुर्गों को स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित करना, और ई-अटेंडेंस जैसे मुद्दे सरकार की संवेदनहीनता को उजागर कर रहे हैं। राज्य सरकार को इन समस्याओं का तत्काल समाधान निकालना होगा, वरना यह आक्रोश भविष्य में बड़े आंदोलन में बदल सकता है।
अगर आप भी मध्यप्रदेश के पेंशनर्स या कर्मचारी हैं और इस विषय पर अपनी राय या समस्या साझा करना चाहते हैं, तो आप हमें कमेंट में जरूर बताएं। आपकी आवाज़ ही बदलाव की शुरुआत है।