कांग्रेस के घेरे में MP का शिक्षा विभाग , एक सवाल ने खोली ट्रांसफर वाली पोल
मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में हुए शिक्षक तबादलों को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। इस बार विभाग ने ऑनलाइन पोर्टल के ज़रिए आवेदन मंगवाए और तबादलों की प्रक्रिया को अंजाम दिया। लेकिन आंकड़े और वास्तविकता में इतना बड़ा अंतर देखने को मिला कि विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे लेकर विधानसभा में सवालों की बौछार कर दी है।
आवेदन 4503, लेकिन तबादले 11,584
शिक्षा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ़ 4503 शिक्षकों ने तबादले के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था, जबकि विभाग ने कुल 11,584 शिक्षकों का तबादला कर दिया। इनमें से 7976 शिक्षक स्वैच्छिक तबादले की श्रेणी में आते हैं, जबकि 3608 शिक्षकों का प्रशासनिक स्तर पर तबादला किया गया। अब कांग्रेस यह सवाल उठा रही है कि जब आवेदन ही 4503 हुए, तो 7976 शिक्षकों के स्वैच्छिक तबादले कैसे संभव हो गए?
कांग्रेस ने उठाए पारदर्शिता और खर्च पर सवाल
विधानसभा में कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि तबादला प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव रहा। उन्होंने कहा कि विभाग ने जिस पोर्टल 3.0 को तबादलों के लिए विकसित किया है, उस पर ₹5.70 करोड़ का खर्च आया। जबकि आज के डिजिटल युग में इतने महंगे पोर्टल की आवश्यकता ही नहीं थी।
उनका कहना है कि यह पोर्टल कई बार क्रैश हुआ, जिस वजह से हजारों शिक्षक आवेदन ही नहीं कर पाए। यही वजह है कि कुल शिक्षकों की तुलना में सिर्फ़ 4 से 5% ने ही आवेदन किया, जबकि नियम के मुताबिक़ 10% शिक्षकों का तबादला होना चाहिए था।
शिक्षा मंत्री ने दिया जवाब
शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार सभी कार्य नियमों के तहत कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय तबादले कागजों पर मनमानी से होते थे, लेकिन अब पूरी प्रक्रिया एक निर्धारित प्रणाली के तहत ऑनलाइन की जाती है।
मंत्री ने बताया कि पोर्टल 3.0 को राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NIXI) के माध्यम से विकसित किया गया है और इसका अनुबंध पांच साल के लिए किया गया है। इस पोर्टल में शिक्षकों व अधिकारियों की व्यक्तिगत जानकारी के साथ-साथ स्वैच्छिक और प्रशासनिक दोनों तरह के तबादलों का पूरा डाटा मौजूद रहता है।
पोर्टल की तकनीकी खामियों से असंतुष्टि
विपक्ष की आपत्ति इस बात पर भी रही कि पोर्टल बार-बार क्रैश होता रहा, जिससे शिक्षक आवेदन नहीं कर पाए। कई स्थानों से यह शिकायतें भी आईं कि पोर्टल पर लॉगिन नहीं हो पा रहा या डेटा ठीक से फीड नहीं हो पा रहा था। इससे संदेह उत्पन्न हुआ कि कहीं तबादला सूची में गड़बड़ी तो नहीं हुई।
मध्य प्रदेश के शिक्षक तबादलों की यह प्रक्रिया पारदर्शिता और विश्वसनीयता के मुद्दों के घेरे में आ गई है। जहां एक ओर सरकार इसे तकनीकी नवाचार बता रही है, वहीं विपक्ष इसके जरिए भ्रष्टाचार और मनमानी की बू महसूस कर रहा है। शिक्षक वर्ग के लिए यह एक अहम मुद्दा है, क्योंकि तबादला न सिर्फ़ उनके कामकाजी जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर भी असर डालता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इस विवाद के समाधान के लिए कोई स्वतंत्र जांच कराएगी या फिर इसे राजनीति के हवाले छोड़ देगी। फिलहाल, शिक्षकों और आम जनता को सिर्फ़ इतना समझ में आया है कि डिजिटल इंडिया की राह में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है जितनी कि तकनीक।